दिल्ली
हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक फैसले
में कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर
वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के उम्मीदवार केंद्र
सरकार की सीधी भर्ती या नौकरियों में
एससी एसटी या ओबीसी श्रेणियों के
समान आयु में छूट या परीक्षा के अतिरिक्त
प्रयास की मांग नहीं कर सकते।
न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और
न्यायमूर्ति अमित महाजन की खंडपीठ
ने स्पष्ट किया कि ईडब्ल्यूएस वर्ग को
होने वाली आर्थिक वंचना को जाति-आधारित भेदभाव के समकक्ष नहीं
माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि
ईडब्ल्यूएस को आयु छूट और प्रयासों
में छूट न देने की सरकारी नीति दुष्प्रेरित,
मनमानी या असंवैधानिक नहीं है।
खंडपीठ ने ईडब्ल्यूएस श्रेणी के कुछ
उम्मीदवारों द्वारा दायर याचिका खारिज
कर दी। याचिकाकर्ताओं ने केंद्र सरकार
की भर्तियों में एससी एसटी और ओबीसी
उम्मीदवारों को मिलने वाली ऊपरी आयु
सीमा में छूट तथा परीक्षा के अतिरिक्त
अवसरों के समान लाभ की मांग की थी।
अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी
की कि विभिन्न आरक्षित श्रेणियों को
अलग-अलग छूट देने का नीतिगत
फैसला विधायिका और कार्यपालिका के
क्षेत्राधिकार में आता है। ईडब्लूएस वर्ग
की वंचना जाति-आधारित ऐतिहासिक
अन्याय से भिन्न है, इसलिए दोनों श्रेणियों
के लिए समान छूट अनिवार्य नहीं है।
यह निर्णय केंद्र सरकार की मौजूदा
नीति को बरकरार रखता है, जिसमें
ईडब्ल्यूएस उम्मीदवारों को सामान्य श्रेणी
की तरह ही आयु सीमा और प्रयासों की
संख्या लागू होती है।
इससे पहले 13 अप्रैल को उत्तर
प्रदेश में भर्ती प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम
कोर्ट का बड़ा और सख्त फैसला सामने
आया था। अदालत ने साफ कर दिया है
कि गलत या अमान्य आय प्रमाण पत्र के
आधार पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग
यानी ईडब्ल्यूएस का लाभ नहीं दिया जा
सकता। इस फैसले से हजारों अभ्यर्थियों
के लिए साफ संदेश गया है कि सरकारी
भर्तियों में नियमों का पालन जरूरी है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की अपील
खारिज करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को
बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने
कहा कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण का लाभ
लेने के लिए आय और संपत्ति का प्रमाण
पत्र सही वित्तीय वर्ष का होना जरूरी है।
कोर्ट ने पाया कि कई उम्मीदवारों ने ऐसे
प्रमाण पत्र लगाए जो या तो गलत वर्ष के थे
या फिरवित्तीय वर्ष पूरा होने से पहले जारी
किए गए थे। ऐसे में उन्हें आरक्षण का लाभ
नहीं दिया जा सकता।