Islamabad में अमेरिका और ईरान के बीच हुई उच्च-स्तरीय शांति वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई। दशकों बाद हुए इस अहम कूटनीतिक प्रयास से स्थायी समाधान की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बन सकी। बढ़ते तनाव के बीच Vladimir Putin ने ईरान के राष्ट्रपति से बातचीत कर मिडिल ईस्ट में शांति स्थापना के लिए मध्यस्थता की पेशकश की है। क्रेमलिन के अनुसार, रूस क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है।
इस बीच Donald Trump ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए Strait of Hormuz में जहाजों की आवाजाही रोकने का ऐलान किया है। ट्रंप ने आरोप लगाया कि ईरान समुद्री मार्ग को असुरक्षित बना रहा है और समझौतों का पालन नहीं कर रहा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी नौसेना तुरंत प्रभाव से होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की जांच और रोकने की प्रक्रिया शुरू करेगी। ट्रंप के इस बयान के बाद पाकिस्तान के दो तेल टैंकर ‘खैरपुर’ और ‘शालीमार’ को बीच रास्ते से लौटना पड़ा।
ट्रंप ने यह भी चेतावनी दी कि जो देश ईरान को हथियारों की सप्लाई करेंगे, उन पर भारी टैरिफ लगाया जाएगा। इस संदर्भ में China और Russia सीधे तौर पर अमेरिका के निशाने पर हैं। उन्होंने कहा कि यदि चीन ईरान को हथियार देता है तो उस पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है।
अमेरिकी अखबार The Wall Street Journal के अनुसार, हाल ही में अमेरिकी नौसेना के दो युद्धपोत होर्मुज से गुजर रहे थे, तभी ईरान के Islamic Revolutionary Guard Corps ने उन्हें रेडियो संदेश के जरिए चेतावनी दी—“लौट जाओ, नहीं तो निशाना बनाया जा सकता है।” जवाब में अमेरिकी पक्ष ने कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मार्ग से गुजर रहा है और किसी टकराव का इरादा नहीं है। अंततः दोनों जहाज बिना किसी संघर्ष के वहां से गुजर गए।
इधर Canada के प्रधानमंत्री Mark Carney ने बड़ा फैसला लेते हुए कहा है कि अब देश का अधिकांश रक्षा बजट घरेलू उद्योगों पर खर्च किया जाएगा। अभी तक कनाडा के सैन्य खर्च का बड़ा हिस्सा अमेरिकी कंपनियों को जाता था, लेकिन नई नीति के तहत इसे कम किया जाएगा। इस कदम को अमेरिका के साथ बढ़ते व्यापारिक तनाव के संदर्भ में देखा जा रहा है।
इस्लामाबाद में वार्ता विफल होने के पीछे कई कारण रहे। सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान का अडिग रुख था। अमेरिका चाहता था कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को तुरंत रोके और भविष्य में परमाणु हथियार न बनाने की गारंटी दे, जबकि ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बताते हुए किसी भी बाहरी दबाव को मानने से इनकार कर दिया।
वार्ता के दौरान माहौल भी तनावपूर्ण रहा। ट्रंप के लगातार आक्रामक बयानों और सैन्य कार्रवाई की चेतावनियों ने भरोसे की कमी को और बढ़ाया। ईरान ने इसे दबाव की रणनीति माना, जबकि अमेरिका इसे कूटनीतिक अवसर बता रहा था।
इसके अलावा Israel द्वारा Lebanon में जारी सैन्य कार्रवाई ने भी बातचीत को प्रभावित किया। ईरान ने मांग की थी कि पहले लेबनान में हमले रोके जाएं, लेकिन इजरायल ने इसे मानने से इनकार कर दिया। प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के सख्त रुख ने स्थिति को और जटिल बना दिया।
Strait of Hormuz को लेकर गतिरोध भी निर्णायक साबित हुआ। यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम है। अमेरिका चाहता था कि इसे तुरंत खोला जाए, जबकि ईरान इसे अपने दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल कर रहा था और प्रतिबंधों में ढील की मांग कर रहा था।
आखिरकार, आपसी अविश्वास इस वार्ता की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर सामने आया। दशकों पुराने तनाव और पिछले अनुभवों के कारण दोनों देश एक-दूसरे के इरादों पर भरोसा नहीं कर सके, जिससे समझौते की संभावनाएं खत्म हो गईं।
इधर लेबनान में इजरायली हमले लगातार जारी हैं, जिससे मानवीय संकट गहराता जा रहा है। कई गांवों में भारी तबाही की खबरें हैं और बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई इलाकों में घरों को विस्फोटकों से उड़ाया गया है, हालांकि इन घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि अभी पूरी तरह नहीं हो पाई है।
Donald Trump ने कहा, “अमेरिकी नौसेना होर्मुज से आने-जाने वाले जहाजों को रोकने की प्रक्रिया शुरू करेगी।” वहीं Vladimir Putin ने कहा, “मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव को कम करने के लिए हम सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार हैं।”