सुप्रीम कोर्ट ने
हाईकोर्ट्स में फैसले सुनाने और उन्हें
सार्वजनिक करने में हो रही देरी पर कड़ी
नाराजगी जताते हुए कहा है कि यह न्याय
व्यवस्था की एक पहचान योग्य बीमारी
बन चुकी है, जिसे अब जड़ से खत्म
करना जरूरी है। अदालत ने साफ शब्दों
में कहा कि समय पर न्याय न मिलना,
न्याय से वंचित किए जाने जैसा ही है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत,
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और
न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ
झारखंड हाईकोर्ट से जुड़े एक मामले की
सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा
गया था कि हाईकोर्ट ने 4 दिसंबर 2025
को याचिका खारिज करने का मौखिक
आदेश तो सुना दिया, लेकिन महीनों बाद
भी उसका लिखित फैसला अपलोड नहीं
किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की ओर से
पेश वकील से कहा कि इस तरह की देरी
का कोई औचित्य नहीं है और निर्देश दिया
कि पूरा फैसला अगले सप्ताह के अंत
तक संबंधित वकील को उपलब्ध कराया
जाए। साथ ही, मामले को फरवरी 16 से
शुरू होने वाले सप्ताह में फिर सूचीबद्ध
करने का आदेश दिया गया।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि
न्यायपालिका के भीतर इस समस्या को
नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा ‘कुछ जज बेहद मेहनती होते
हैं, कई मामलों की सुनवाई कर फैसले
सुरक्षित रखते हैं, लेकिन फिर लंबे समय
तक निर्णय नहीं देते। यह व्यक्तिगत
आरोप नहीं है, बल्कि पूरी न्यायपालिका
के सामने एक चुनौती है। यह बीमारी है
और इसे फैलने नहीं दिया जा सकता।’
सीजेआई ने यह भी चिंता जताई कि
कई मामलों में बहस पूरी होने के बाद भी
केस को बार-बार आगे के निर्देशों के
लिए सूचीबद्ध किया जाता है, जिससे
अनावश्यक मुकदमेबाजी बढ़ती है।
सीजेआई ने अपने अनुभव का जिक्र
करते हुए कहा कि हाईकोर्ट जज के रूप
में अपने 15 वर्षों के कार्यकाल में मैंने कभी
भी ऐसा नहीं किया कि फैसला सुरक्षित
रखा हो और तीन महीने के भीतर सुनाया
न हो। याचिकाकर्ता की ओर से पेश
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा
ऐसा लगता है जैसे केवल औपचारिकता
निभाई जा रही है। कोई सख्त संदेश जाना
जरूरी है। यह कानून की गरिमा के साथ
खिलवाड़ है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत
ने बताया कि वह इस मुद्दे को हाईकोर्ट्स
के मुख्य न्यायाधीशों की आगामी बैठक
में उठाएंगे। उन्होंने कहा हम इस पर चर्चा
करेंगे और ऐसा समाधान निकालने की
कोशिश करेंगे, जिससे इस तरह की टाली
जा सकने वाली कानूनी कार्यवाही खत्म
हो।
गौरतलब है कि नवंबर 2025 में सुप्रीम
कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट्स को निर्देश दियाथा
कि वे आरक्षित फैसलों से जुड़ी विस्तृत
रिपोर्ट सौंपें, जिसमें फैसला सुरक्षित रखने
की तारीख, सुनाए जाने की तारीख और
अपलोड करने की तारीख स्पष्ट रूप से
दर्ज हो। सुप्रीम कोर्ट इन निर्देशों के पालन
की लगातार निगरानी कर रहा है।