वारदात

सोमनाथ मंदिर: सिर्फ आस्था का स्थल नहीं, बल्कि समेटे हुए है भारत का हजारों साल पुराना इतिहास

सोमनाथ मंदिर भारत की प्राचीन संस्कृति और आस्था का प्रतीक है, जो इतिहास की गौरवशाली धरोहर को दर्शाता है।

सोमनाथ मंदिर सिर्फ पत्थरों से बना कोई ढांचा या केवल पूजा की जगह नहीं है। यह भारत की उस सभ्यता की आत्मा का प्रतीक है, जो हजारों साल पुरानी है, जिस पर बार-बार हमले हुए, लेकिन जिसे कभी पूरी तरह तोड़ा नहीं जा सका। सोमनाथ की कहानी दरअसल आस्था, स्मृति और समय के साथ एक सभ्यता के रिश्ते की कहानी है। इसे बारबार नष्ट करने की कोशिश की गई, लेकिन हर बार यह पहले से ज्यादा मजबूती के साथ खड़ा हुआ। साल 2026 भारत के लिए खास मायने रखता है। एक तरफ यह सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले बड़े हमले को पूरे एक हजार साल पूरे होने का वर्ष है, जब 1026 ईस्वी में गजनी के महमूद ने इस पवित्र स्थल पर आक्रमण किया था। दूसरी ओर, यह 1951 में हुए आधुनिक सोमनाथ मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा के 75 साल यानी प्लेटिनम जुबली का साल भी है। विनाश से पुनर्जागरण तक की यह हजार साल की यात्रा अपने आप में भारत की जीवटता को दिखाती है। इसी ऐतिहासिक मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने लेख के जरिए इस क्षण को याद किया और इसके महत्व को रेखांकित किया।

अगर सोमनाथ की कहानी देखें, तो यह दुनिया के इतिहास में शायद इकलौती ऐसी जगह है जिसे बारबार तोड़ा गया, लेकिन हर बार फिर से बनाया गया। के.एम. मुंशी ने अपनी मशहूर किताब ‘सोमनाथ: द श्राइन इटरनल’ में लिखा है कि सोमनाथ को सृष्टि जितना ही प्राचीन माना जाता है। मुंशी सिर्फ लेखक ही नहीं थे, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी और आजाद भारत में नेहरू मंत्रिमंडल में मंत्री भी रहे। उनकी किताब में दर्ज घटनाएं बताती हैं कि सोमनाथ को मिटाने की हर कोशिश नाकाम रही। मुंशी के अनुसार, महमूद गजनवी 18 अक्टूबर 1025 को सोमनाथ की ओर चला और करीब 80 दिन बाद, 6 जनवरी 1026 को उसने इस किलेबंद मंदिर नगरी पर हमला किया। कहा जाता है कि करीब 50 हजार लोग मंदिर की रक्षा करते हुए मारे गए। इसके बाद गजनवी ने मंदिर को लूटा, गर्भगृह को अपवित्र किया और शिवलिंग को तोड़ दिया। लेकिन यहीं कहानी खत्म नहीं होती। 1299 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति अलाफ खान ने फिर मंदिर को नष्ट किया और मूर्ति के टुकड़े दिल्ली ले गया। कुछ सालों बादहिंदू शासकों ने इसे फिर से खड़ा किया। 1394 में गुजरात के गवर्नर मुजफ्फर खान ने मंदिर को तोड़ा। 1459 में महमूद बेगड़ा ने भी सोमनाथ को अपवित्र किया। इसके बावजूद मंदिर किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा। औरंगजेब के दौर में भी सोमनाथ को नहीं बख्शा गया। 1669 में उसने मंदिर को गिराने का आदेश दिया और 1702 में इसे पूरी तरह नष्ट करने का फरमान जारी किया। 1706 में यहां मस्जिद बना दी गई