बेबाक बात

डेटा नहीं, ड्रामा चला रहा शेयर बाजार

ट्रंप के हर दिन बदलते बयान निवेशकों के लिए बन रहे हैं सबसे बड़ी त्रासदी

बीते हफ्ते न्यूयॉर्क की हवा में एक अजीब-सी बेचैनी थी। वॉल स्ट्रीट की इमारतों के अंदर स्क्रीनें चमक रही थीं, ट्रेडरों की उंगलियां कीबोर्ड पर तेजी से दौड़ रही थीं, लेकिन दुनिया की नजरें व्हाइट हाउस के प्रेस रूम पर टिकी थीं। उसी समय दिल्ली के निर्माण विहार स्थित अपने फ्लैट में बैठे राजीव अग्रवाल लैपटॉप पर अमेरिकी प्री-मार्केट देख रहे थे। उन्होंने पिछले कुछ हफ्तों में टेक, ऑयल और ETF में मोटा निवेश किया था। उन्हें लग रहा था कि दुनिया में बढ़ते तनाव के बीच यही सबसे सुरक्षित दांव है।

तभी टीवी पर ब्रेकिंग फ्लैश हुआ कि Donald Trump ने कहा—“हम वॉर जीत चुके हैं।” कमरे में एक पल को सन्नाटा छा गया, लेकिन राजीव के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। उन्हें लगा कि अब वैश्विक तनाव कम होगा, तेल और गैस के दाम स्थिर होंगे और बाजार गैप-अप के साथ खुलेगा।

हालांकि, बाजार युद्ध की जीत से कम और भविष्य की अनिश्चितता पर ज्यादा निर्भर करता है। जल्द ही एक और बयान आया—ट्रंप ने कहा कि ईरान के पास 48 घंटे हैं, या तो होर्मुज जलडमरूमध्य खोले, वरना बड़े हमले के लिए तैयार रहे। राजीव फोन पर बुदबुदाए, “अगर कल युद्ध जीत लिया था, तो आज 48 घंटे का अल्टीमेटम क्यों?” अब उन्हें समझ आ रहा था कि इसका असर बाजार पर पड़ेगा।

इससे पहले ट्रंप ने कहा था कि युद्धविराम पर तभी बात होगी, जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुला, सुरक्षित और साफ होगा। यहीं से बाजार ने करवट बदल ली। कच्चे तेल के दाम ऊपर भागे, एयरलाइन शेयर गिर गए और सोना चमक उठा। राजीव ने अपना पोर्टफोलियो खोला—जो पहले हरा दिख रहा था, उसमें अब लाल निशान फैल चुके थे।

फिर कहानी में नया मोड़ आया। ट्रंप ने कहा—“ईरान साफ हो चुका है।” टीवी चैनलों पर इसे निर्णायक बयान बताया गया, लेकिन जमीनी रिपोर्ट्स कुछ और ही कह रही थीं। राजीव ने सोचा कि अगर सच में ऐसा है, तो तेल के दाम गिरने चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्हें महसूस हुआ कि बाजार मिसाइलों से कम और जोखिम (रिस्क) की कीमत से ज्यादा चलता है। जब भविष्य धुंधला हो, तो जीत का दावा भी निवेशकों को भरोसा नहीं दिला पाता।

इसके बाद ट्रंप ने कहा कि दुनिया को शांति सुनिश्चित करने में मदद करनी चाहिए। यूरोप, खाड़ी देशों और एशियाई साझेदारों के साथ बातचीत की खबरें आने लगीं। वॉल स्ट्रीट ने इसे कमजोरी के संकेत के रूप में लिया। राजीव ने सोचा कि क्या अपनी SIP रोक दें, लेकिन फिर खुद को समझाया कि लंबी अवधि के निवेश में उतार-चढ़ाव सामान्य हैं।

फिर नैरेटिव बदला। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को किसी की मदद की जरूरत नहीं है और वह अकेले इस स्थिति से निपट सकता है। राजीव ने माथा पकड़ लिया—कल तक दुनिया से मदद की बात, और आज अकेले लड़ाई? डॉलर मजबूत हुआ, उभरती अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी कमजोर हुई और कच्चे तेल के दाम फिर बढ़ गए। राजीव को लगने लगा कि वह कंपनियों के फंडामेंटल नहीं, बल्कि बाजार के मूड में ट्रेड कर रहे हैं।

अल्टीमेटम के बीच ट्रंप का रुख फिर नरम पड़ा। उन्होंने कहा कि उनकी पहली पसंद बातचीत है। उस दिन तेल के दाम थोड़े नीचे आए, शेयर बाजार में रिकवरी हुई और सोना नरम पड़ा। राजीव ने राहत की सांस ली और गिरावट में कुछ और ETF खरीद लिए।

लेकिन बयानों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। ट्रंप ने फिर कहा कि युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ है। बाजार एक बार फिर टूट गया। नई खरीदी गई पोजीशन फिर लाल हो गई। एशियाई बाजार दबाव में आ गए, अमेरिकी फ्यूचर्स कमजोर पड़े और कच्चा तेल फिर ऊपर चढ़ गया। अब राजीव को समझ आ चुका था कि असली समस्या युद्ध नहीं, बल्कि हर दिन बदलती नीतिगत संदेशबाजी है।

सात दिनों के इस उतार-चढ़ाव के बाद शनिवार की रात राजीव अपनी बालकनी में बैठे थे। नीचे शहर की रोशनी चमक रही थी, लेकिन उनके लैपटॉप की स्क्रीन पर पोर्टफोलियो लाल था। कुछ ट्रेड सही निकले, कुछ गलत, लेकिन सबसे बड़ा नुकसान पैसों का नहीं, बल्कि उनके भरोसे का हुआ था।

उन्हें लगा था कि बाजार डेटा, अर्निंग्स और मैक्रो इकोनॉमिक संकेतकों से चलता है, लेकिन अब उन्हें समझ आया कि कई बार बाजार सिर्फ एक बयान, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस, एक सोशल मीडिया पोस्ट और एक अल्टीमेटम से हिल जाता है।

उन्होंने अपनी डायरी में लिखा—गुरुवार को जीत, शनिवार को धमकी, रविवार को दुश्मन खत्म, सोमवार को मदद, मंगलवार को अकेले लड़ाई, बुधवार को शांति, गुरुवार को फिर युद्ध… और हर दिन सबसे ज्यादा पिसता है वह आम निवेशक, जो अपने परिवार के लिए SIP करता है, भविष्य के सपने देखता है और बाजार की हर चाल पर नजर रखता है।

शायद यही आधुनिक निवेशक की सबसे बड़ी त्रासदी है।