देश विदेश

चुनाव की बिसात पर विस्तार

योगी सरकार के मंत्रिमंडल में फेरबदल, 6 नए चेहरे शामिल

 

उत्तर प्रदेश में बीजेपी के नेतृत्व वाली Yogi Adityanath सरकार के मंत्रिमंडल में रविवार को फेरबदल किया गया। सरकार में 2 कैबिनेट और 4 राज्य मंत्रियों को शामिल किया गया, जबकि 2 राज्य मंत्रियों को स्वतंत्र प्रभार देकर पदोन्नत किया गया। इस मंत्रिमंडल विस्तार को केवल प्रशासनिक बदलाव के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी से जोड़कर समझा जा रहा है।

योगी सरकार के इस आखिरी मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सभी 60 मंत्री पद भर चुके हैं। मौजूदा मंत्रिमंडल में 25 ओबीसी, 22 सवर्ण और 10 दलित मंत्री शामिल हैं, जबकि 1 आदिवासी, 1 मुस्लिम और 1 सिख मंत्री को भी जगह दी गई है। लोकसभा चुनाव 2024 में यूपी में हुए नुकसान के बाद बीजेपी खासतौर पर ओबीसी और दलित वोट बैंक को दोबारा मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। यही वजह है कि इस विस्तार में सामाजिक संतुलन पर सबसे ज्यादा जोर दिखाई दिया।

ब्राह्मण प्रतिनिधित्व को लेकर भी पार्टी ने बड़ा संदेश देने की कोशिश की है। 2024 में Jitin Prasada के सांसद और केंद्रीय मंत्री बनने के बाद योगी मंत्रिमंडल में ब्राह्मण चेहरों की संख्या कम हो गई थी। अब मनोज पांडे को कैबिनेट में शामिल कर बीजेपी ने ब्राह्मण संतुलन साधने की कोशिश की है। राजनीतिक तौर पर इसे जितिन प्रसाद के रिप्लेसमेंट और 2027 की चुनावी रणनीति दोनों के रूप में देखा जा रहा है।

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी को यूपी में अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। पार्टी 80 में से सिर्फ 33 सीटों पर सिमट गई थी। इसके बाद से संगठन और सरकार दोनों स्तर पर लगातार मंथन चल रहा था। यही वजह है कि मंत्रिमंडल में ओबीसी चेहरों को प्रमुखता देने की कोशिश की गई। मौजूदा मंत्रिमंडल में 25 ओबीसी मंत्री शामिल हैं, जो सबसे बड़ा सामाजिक वर्ग है।

इसके अलावा बीजेपी ने पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिमी यूपी के बीच भी संतुलन साधने की रणनीति अपनाई है। पार्टी जानती है कि 2027 की राह सिर्फ हिंदुत्व के मुद्दे से आसान नहीं होने वाली। उसे जातीय समीकरणों और स्थानीय नेतृत्व दोनों को साथ लेकर चलना होगा। मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए क्षेत्रीय नेताओं को प्रतिनिधित्व देकर पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि हर इलाके की हिस्सेदारी सरकार में सुनिश्चित है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विस्तार सिर्फ मंत्रियों की संख्या बढ़ाने का फैसला नहीं, बल्कि 2027 की चुनावी बिसात का हिस्सा है। बीजेपी यह समझ चुकी है कि यूपी में मुकाबला पहले से ज्यादा कठिन हो चुका है। Samajwadi Party और Indian National Congress के गठबंधन ने लोकसभा चुनाव में बीजेपी को कड़ी चुनौती दी थी। ऐसे में पार्टी अब उन वर्गों को दोबारा साधने की कोशिश कर रही है, जिनमें नाराजगी या दूरी की चर्चा रही है।

इसके साथ ही बीजेपी संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल का संदेश भी देना चाहती है। लंबे समय से चर्चा थी कि सरकार में कुछ नए चेहरों को मौका देकर कार्यकर्ताओं और विधायकों में नई ऊर्जा भरने की जरूरत है। मंत्रिमंडल विस्तार को उसी दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है।

यानी साफ है कि योगी सरकार का यह मंत्रिमंडल विस्तार सिर्फ सत्ता संचालन का फैसला नहीं, बल्कि 2027 की तैयारी का राजनीतिक संदेश है। बीजेपी ने सामाजिक संतुलन, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक समीकरणों को साधने की कोशिश की है। अब देखने वाली बात यह होगी कि यह रणनीति पार्टी को कितना राजनीतिक फायदा दिला पाती है। 

नए चेहरों की एंट्री के साथ ही पार्टी के भीतर नाराजगी भी खुलकर सामने आने लगी है। महमूदाबाद से बीजेपी विधायक Asha Maurya मंत्री पद नहीं मिलने से नाराज दिखीं। उन्होंने कहा कि पार्टी अब मौर्य समाज की अनदेखी कर दलबदलुओं को प्राथमिकता दे रही है। वहीं, पूर्व सांसद Brij Bhushan Sharan Singh ने भी ठाकुर चेहरे को जगह न मिलने पर शायराना अंदाज में तंज कसकर असंतोष जाहिर किया।

दरअसल, आशा मौर्य का नाम आखिरी वक्त तक चर्चा में था, लेकिन सूची से बाहर होने पर उन्होंने फेसबुक पोस्ट के जरिए नाराजगी जाहिर की। उन्होंने लिखा कि मौर्य समाज के संघर्षशील और निष्ठावान लोगों की जरूरत अब पार्टी को नहीं दिख रही है और बागी व दलबदलुओं को प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि बाद में उन्होंने पोस्ट से ये बातें हटा दीं।

इसके बाद आशा मौर्य ने लिखा, “पार्टी और संगठन के लिए पिछले 35 वर्षों से पूर्ण समर्पण भाव, निष्ठा और ईमानदारी के साथ कार्य करते हुए सदैव संगठन हित को सर्वोपरि रखा है। जनसेवा और समाजहित के लिए निरंतर कार्य करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य रहा है और आगे भी पूरी निष्ठा एवं समर्पण के साथ कार्य करती रहूंगी।”

उन्होंने आगे कहा, “एक समर्पित कार्यकर्ता होने के नाते मन में थोड़ी पीड़ा अवश्य हुई है, क्योंकि वर्षों की मेहनत, संघर्ष और निष्ठा हर कार्यकर्ता के लिए भावनात्मक रूप से जुड़ी होती है। लेकिन यह पीड़ा मेरे संकल्प को कमजोर नहीं करेगी, बल्कि समाज और संगठन के प्रति मेरी जिम्मेदारियों को और मजबूत करेगी।”

उधर, पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह भी मंत्रिमंडल विस्तार से नाखुश दिखे। माना जा रहा था कि वह अपने बेटे प्रतीक भूषण के लिए मंत्री पद चाहते थे। किसी ठाकुर चेहरे को जगह न मिलने पर उन्होंने एक्स पर शायराना अंदाज में लिखा, “शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है, जिस शाख पर बैठे हो वह टूट भी सकती है।”