स्वास्थ्य

सही समय पर जांच और इलाज से कई ब्लड बीमारियां हो सकती हैं ठीक

समय पर जांच और इलाज से गंभीर रक्त रोगों पर पाया जा सकता है नियंत्रण

ब्लड डिसऑर्डर यानी रक्त संबंधी बीमारियां ऐसी स्थितियां हैं, जिनमें शरीर की रक्त कोशिकाओं को बनाने, नियंत्रित करने या सही तरीके से इस्तेमाल करने की क्षमता प्रभावित हो जाती है। ये बीमारियां हल्की और आसानी से नियंत्रित होने वाली भी हो सकती हैं, जबकि कुछ मामलों में यह गंभीर और जानलेवा रूप भी ले सकती हैं।

आज के समय में बेहतर जांच तकनीकों, बढ़ती जागरूकता और आधुनिक इलाज की वजह से अधिकांश ब्लड डिसऑर्डर्स का प्रभावी इलाज संभव हो गया है और कई मामलों में मरीज पूरी तरह ठीक भी हो सकते हैं। ब्लड डिसऑर्डर्स कई प्रकार के होते हैं। रेड ब्लड सेल से जुड़ी बीमारियों में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया, थैलेसीमिया और सिकल सेल डिजीज शामिल हैं। इन बीमारियों में मरीज को लगातार थकान, सांस फूलना, चक्कर आना और त्वचा का पीला पड़ना जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

थैलेसीमिया मेजर और सिकल सेल डिजीज जैसी आनुवांशिक बीमारियों में लंबे समय तक निगरानी और इलाज की आवश्यकता होती है तथा कई मामलों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट स्थायी इलाज का विकल्प बन सकता है। वहीं व्हाइट ब्लड सेल से जुड़ी बीमारियों जैसे ल्यूकेमिया, लिम्फोमा और इम्यून-डिफिशिएंसी डिसऑर्डर्स में बार-बार संक्रमण होना, लंबे समय तक बुखार रहना, अचानक वजन घटना और लिम्फ नोड्स का बढ़ना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इन बीमारियों में समय रहते पहचान और इलाज बेहद महत्वपूर्ण होता है।

मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, वैशाली के मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर केयर के ब्लड डिसऑर्डर्स, हीमैटो ऑन्कोलॉजी एवं बोन मैरो ट्रांसप्लांट विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. प्रदीप कुमार ने बताया “इसके अलावा प्लेटलेट्स और ब्लीडिंग डिसऑर्डर्स जैसे हीमोफीलिया, इम्यून थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (ITP) और क्लॉटिंग संबंधी समस्याओं में मामूली चोट पर ज्यादा खून बहना, बार-बार नाक से खून आना, महिलाओं में अत्यधिक मासिक रक्तस्राव या सर्जरी के दौरान अत्यधिक ब्लीडिंग जैसी समस्याएं हो सकती हैं। आधुनिक उपचार की मदद से इन बीमारियों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

वहीं एप्लास्टिक एनीमिया और मायलोडिस्प्लास्टिक सिंड्रोम (MDS) जैसे बोन मैरो फेल्योर सिंड्रोम में शरीर में सभी प्रकार की रक्त कोशिकाएं कम होने लगती हैं, जिससे कमजोरी, संक्रमण और बार-बार ब्लीडिंग की समस्या हो सकती है। ऐसे मामलों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट लंबे समय के इलाज का प्रभावी विकल्प माना जाता है।