उर्दू अदब का
एक नरम लहजा हमेशा के लिए खामोश
हो गया। अपनी सादगी भरी शायरी से
करोड़ों दिलों में जगह बनाने वाले शायर
बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे।
पद्मश्री से सम्मानित बशीर बद्र ने गुरुवार
को भोपाल स्थित अपने आवास पर
अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ ही
उर्दू शायरी का एक ऐसा खूबसूरत और
नरम लहजा खामोश हो गया, जिसने आम
आदमी की भावनाओं को बेहद आसान
शब्दों में दुनिया के सामने रखा। उनके
निधन से प्रशंसक कसक के साथ बस
इतना ही कह पाए “फिर से खुदा बनाएगा
कोई नया जहां, दुनिया को यूं मिटाएगी
इक्कीसवीं सदी...।”
उनके जाने के साथ
ही उर्दू शायरी का वह दौर भी जैसे थम
गया, जिसने रिश्तों, तन्हाई, मोहब्बत
और जिंदगी की सच्चाइयों को बेहद
आसान शब्दों में लोगों तक पहुंचाया।
उनके शब्दों में ऐसा जादूथा कि आज
भी पाठक कहने को विवश हैं “न जी भर
के देखा, न कुछ बात की… बड़ी आरजूथी
मुलाकात की…।” 91 वर्षीय बशीर बद्र लंबे
समय से डिमेंशिया के साथ ही उम्र संबंधी
बीमारियों से जूझ रहे थे। पिछले कुछ
सालों से उनकी याददाश्त कमजोर हो गई
थी। जानकारी के अनुसार, वह लोगों को
पहचान भी नहीं पा रहे थे।
बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी
1935 को अयोध्या में हुआ था।
उनका
असली नाम सैयद मोहम्मद बशीर था।
उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
से पढ़ाई की और बाद में मेरठ कॉलेज में
उर्दू के प्रोफेसर बने। अध्यापन के साथसाथ उनकी शायरी भी लोगों के दिलों तक
पहुंचती गई। 1970 और 80 के दशक
में उनकी गजलों ने देश-दुनिया में खास
छाप छोड़ी। बद्र की सबसे बड़ी खासियत
यह थी कि उन्होंने उर्दू शायरी को मुश्किल
अल्फाज से निकालकर आम बोलचाल
की भाषा में ढाल दिया। उनकी गजलों में
जिंदगी की सच्चाई, रिश्तों की नर्मी और
उलझन, मोहब्बत का रस, दर्द और
इंसानी एहसास साफ दिखाई देते थे।
यही
वजह रही कि उनके एक-एक शब्द आम
लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन गए।
उनके मशहूर शेर पर नजर डालें तो
कई हैं, यहां कुछ चुनिंद शेर हैं- “कुछ तो
मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं
होता…” आज भी अधूरी मोहब्बत और टूटे
रिश्तों का सबसे सादा और गहरा बयान
माना जाता है।
वहीं, बदलते समाज और
रिश्तों में बढ़ती दूरियों को बेहद खूबसूरती
से बयां करती है “कोई हाथ भी न मिलाएगा
जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज
का शहर है, जरा फासले से मिला करो…।”
उनकी शायरी सिर्फप्रेम तक सीमित
नहीं थी। शेर “लोग टूट जाते हैं एक घर
बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां
जलाने में…” समाज की बेरुखी पर गहरी
चोट करती है। बशीर बद्र ने जिंदगी की
तन्हाई और उसकी सच्चाइयों को भी
अपने अंदाज में पेश किया, “उजाले
अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न
जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो
जाए…” और “जिंदगी तू ने मुझे कब्र से कम
दी है जमीं, पांव फैलाऊं तो दीवार में सर
लगता है…।”