अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते (पीस डील) को लेकर महीनों से जारी खींचतान अब खत्म होती नजर आ रही है। दोनों देशों के बीच होने वाले समझौते का एक ड्राफ्ट सामने आया है, जिसमें परमाणु कार्यक्रम, तेल कारोबार, होर्मुज स्ट्रेट और अरबों डॉलर के फ्रीज्ड फंड समेत कई अहम मुद्दों पर सहमति बनने का दावा किया गया है।
हालांकि, रविवार को इजरायल ने लेबनान की राजधानी बेरूत के आसपास के इलाकों में बड़ा हमला किया। इजरायली सेना का कहना है कि यह कार्रवाई हिज्बुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाकर की गई। इस हमले से ईरान इतना नाराज हो गया कि प्रस्तावित डील के टूटने की आशंका पैदा हो गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस हमले पर नाराजगी जताते हुए कहा कि यह हमला नहीं होना चाहिए था। वहीं, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने कहा कि संकट से निकलने का सबसे बेहतर रास्ता बातचीत ही है।
इससे पहले, रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने बताया कि प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान ने यह वादा किया है कि वह न तो परमाणु हथियार बनाएगा और न ही उन्हें किसी अन्य तरीके से हासिल करने की कोशिश करेगा। यह अमेरिका की सबसे बड़ी मांगों में से एक रही है।
ड्राफ्ट के अनुसार, ईरान के पास मौजूद उच्च स्तर पर संवर्धित (Highly Enriched) यूरेनियम का संवर्धन स्तर भी कम किया जाएगा। हालांकि, यह प्रक्रिया किस तरह लागू होगी, इस पर अभी अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। दोनों पक्ष अगले 60 दिनों के भीतर इसकी तकनीकी रूपरेखा तय करेंगे।
समझौते का सबसे बड़ा आकर्षण ईरान के फ्रीज्ड फंड को लेकर है। ईरानी अधिकारी का दावा है कि अमेरिका करीब 25 अरब डॉलर के फ्रीज्ड फंड को जारी करने पर सहमत हो गया है। इसमें प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण (Direct Cash Transfer), क्षेत्रीय देशों के सहयोग और वित्तीय क्रेडिट लाइन जैसी व्यवस्थाएं शामिल हो सकती हैं।
इसके अलावा, अमेरिका कुछ समय के लिए ईरान पर लगे तेल प्रतिबंधों में भी ढील देगा। इससे ईरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में दोबारा तेल बेच सकेगा और उससे होने वाली कमाई अपने पास रख सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ईरान की अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत दे सकता है, जो वर्षों से पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रही है।
हालांकि, समझौते को लेकर अभी पूरी तरह स्पष्टता नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि इस समझौते पर रविवार को हस्ताक्षर हो सकते हैं। वहीं, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी कहा है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से हस्ताक्षर की तैयारियां चल रही हैं, जिसके बाद तकनीकी स्तर की बातचीत शुरू होगी।
दूसरी ओर, ईरान के भीतर इस समझौते को लेकर विरोध भी देखने को मिल रहा है। कट्टरपंथी समूहों और कुछ राजनीतिक धड़ों ने डील के समय और उसकी शर्तों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अमेरिका पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता।
फिलहाल यह ड्राफ्ट समझौता अंतिम रूप से लागू नहीं हुआ है, लेकिन यदि दोनों पक्ष इस पर सहमत हो जाते हैं तो यह हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलताओं में से एक माना जाएगा। इससे न केवल अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
डील में होर्मुज स्ट्रेट का मुद्दा भी शामिल है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान सभी व्यावसायिक जहाजों के लिए होर्मुज स्ट्रेट को तुरंत खोल देगा। इसके बदले अमेरिका ईरानी जहाजों और बंदरगाहों पर लगाई गई नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त करेगा।
यदि यह समझौता लागू होता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार को भी राहत मिल सकती है। पिछले कई महीनों से होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव के कारण तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है। ऐसे में निवेशकों और ऊर्जा कंपनियों की नजरें इस समझौते पर टिकी हुई हैं।